उत्तर प्रदेश, जो आबादी के लिहाज से देश का सबसे बड़ा राज्य है और जिसे 'उत्तम प्रदेश' बनाने का संकल्प बार-बार दोहराया जाता है, आज एक बड़े सामाजिक संक्रमण काल से गुजर रहा है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने कानून-व्यवस्था को सुधारने और महिलाओं की सुरक्षा के लिए 'मिशन शक्ति' जैसे बड़े अभियान चलाए हैं। पुलिस थानों में महिला हेल्प डेस्क की स्थापना, 'एन्टी रोमियो स्क्वाड' का गठन और अपराधियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई (जिसमें 'बुलडोजर संस्कृति' और सख्त कानूनी धाराएं शामिल हैं) के जरिए अपराधियों में डर पैदा करने की कोशिश की गई है। सरकार का यह दावा कुछ हद तक सही हो सकता है कि संगीन अपराधों के बाद अब पुलिस की कार्रवाई पहले के मुकाबले ज्यादा आक्रामक और तेज हुई है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अपराध होने के बाद की जाने वाली सख्त कार्रवाई से ज्यादा जरूरी है—ऐसी कानून-व्यवस्था का निर्माण, जहाँ अपराध घटित ही न हो सके।
यूपी जैसे विशाल राज्य की भौगोलिक और सामाजिक संरचना बेहद जटिल है। यहाँ नोएडा, गाजियाबाद, लखनऊ और कानपुर जैसे आधुनिक महानगर भी हैं, तो वहीं बुंदेलखंड, पूर्वांचल और पश्चिमी यूपी के सुदूर ग्रामीण इलाके भी हैं। शहरी क्षेत्रों में जहाँ कामकाजी महिलाओं के लिए नाइट शिफ्ट, सार्वजनिक परिवहन और डिजिटल स्पेस (साइबर क्राइम) में सुरक्षा एक बड़ी चुनौती है, वहीं ग्रामीण इलाकों में जातिगत वर्चस्व, अशिक्षा और सामाजिक रुढ़िवादिता के कारण बेटियों को ज्यादा प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। कई बार ग्रामीण क्षेत्रों में दबंगों के डर या सामाजिक लोक-लाज के कारण अपराध थाने तक पहुँच ही नहीं पाते। जब तक प्रशासन सुदूर गाँवों के आखिरी छोर पर बैठी दलित, शोषित या सामान्य वर्ग की बेटी को यह भरोसा नहीं दिला पाता कि कानून उसके साथ खड़ा है, तब तक नीतियाँ कागजी ही रहेंगी।
कानून को कड़ाई से लागू करने के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा आज भी पुलिस तंत्र की संवेदनशीलता की कमी है। हालांकि 'महिला पुलिस कर्मियों' की तैनाती बढ़ाई गई है, लेकिन आज भी जब कोई पीड़िता या उसका परिवार थाने पहुँचता है, तो कई जगहों पर उन्हें सहानुभूति के बजाय सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। 'एफआईआर' दर्ज करने में होने वाली देरी या मामले को दबाने की कोशिश अपराधियों के हौसले बढ़ाती है। उत्तर प्रदेश को अपराधियों के मन में ऐसा खौफ पैदा करना होगा जो केवल बयानों में न दिखे, बल्कि त्वरित न्याय (Speedy Trial) और फास्ट-ट्रैक अदालतों के फैसलों में नजर आए। न्याय में देरी भी एक तरह का अन्याय है, और यूपी के संदर्भ में अदालतों में लंबित मामलों का अंबार इस न्याय प्रक्रिया को धीमा करता है।
इसके साथ ही, हमें यह स्वीकार करना होगा कि केवल पुलिस की लाठी या सख्त कानून के दम पर समाज को सुधारा नहीं जा सकता। उत्तर प्रदेश के समाज में आज भी पितृसत्तात्मक सोच और पुरुष प्रधान अहंकार की जड़ें बहुत गहरी हैं। जब तक बेटों को यह संस्कार नहीं दिया जाएगा कि महिला कोई उपभोग की वस्तु नहीं बल्कि समाज का बराबर का हिस्सा है, तब तक स्थितियां नहीं बदलेंगी। चाहे वह पंचायतें हों, स्थानीय जनप्रतिनिधि हों या परिवार के बुजुर्ग—सभी को अपनी सोच बदलनी होगी। बेटियों को 'सुरक्षा के नाम पर घरों में कैद रखने' के बजाय, बेटों की बेलगाम आजादी पर अंकुश लगाना होगा।
उत्तर प्रदेश देश की राजनीति और दिशा तय करने वाला राज्य है। यदि यूपी अपनी बेटियों को एक पूरी तरह सुरक्षित, गरिमापूर्ण और भयमुक्त वातावरण देने में सफल हो जाता है, तो यह पूरे देश के लिए एक नजीर बनेगा। 'मिशन शक्ति' जैसे अभियानों को केवल सरकारी आयोजनों और विज्ञापनों तक सीमित रखने के बजाय, इन्हें जन-आंदोलन बनाना होगा। सरकार, पुलिस, न्यायपालिका और सबसे बढ़कर समाज के हर नागरिक को एक साथ आना होगा। उत्तर प्रदेश की प्रगति तभी वास्तविक और गौरवशाली कहलाएगी, जब यहाँ की हर बेटी चाहे वह खेत-खलिहान में काम कर रही हो, स्कूल-कॉलेज जा रही हो या किसी दफ्तर से देर रात घर लौट


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